Tuesday, May 20, 2008

कैसे मैं दूं अब धन्यवाद


संदर्भ: http://udantashtari.blogspot.com/2008/05/blog-post_18.html

आप सभी का धन्यवाद, मैं सोच रहा कैसे दे पाऊँ
जो जल जल कर बुझ जाती उस दीपशिखा सा था एकाकी
किन्तु आपने बरसाई जो स्नेह सुधा मेरे आँगन में
उससे इस रीते प्याले को भर देती सुधियों की साकी

शब्दों की इस यात्रा में हम जो चले साथ हो सहराही
तब ही मैं नूतन शैली में आयाम विचारा करता हूँ
क्रन्दन का आंसू से नाता, छन्दों का गीतों से रिश्ता
कोसों हों मुझसे दूर आप, मैं लेकिन निकट समझता हूँ

यह कलम कभी चलते चलते रुकने को होती थी आतुर
पर मिला आपका स्नेह मुझे, वह तोड़ेगा हर सूनापन
जो धवल चाँदनी के टुकड़े भेजे हैं शब्दों में रँगकर
उनसे मैं चित्रित कर लूंगा, अपने विश्वासों का आँगन



2 टिप्पणियाँ:

At 7:12 AM, Blogger Udan Tashtari said...

बिल्कुल, आपकी लेखनी का हर वक्त इन्तजार लगा रहता है. बस, आप तो अपनी कथनी कहते रहें, कविता खुद ब खुद रच जायेगी. :)

 
At 7:17 AM, Blogger अनूप शुक्ल said...

फ़िर से बधाई!

 

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