माँ है स्वदेश ,
मैं बसा परदेश ,
अशांत मन
है अनपढ़ ,
सहमी औ अस्वस्थ ,
बूढी होती माँ
पतझड़ सी,
रेगिस्तानी रेत सी,
सूख चुकी माँ
कजरी छंद ,
सोहर वाले गीत,
गाती रहे माँ
माँ है स्वदेश ,
मैं बसा परदेश ,
अशांत मन
है अनपढ़ ,
सहमी औ अस्वस्थ ,
बूढी होती माँ
पतझड़ सी,
रेगिस्तानी रेत सी,
सूख चुकी माँ
कजरी छंद ,
सोहर वाले गीत,
गाती रहे माँ
3 comments:
Hello Avaneesh ji,
It is really a very good and emotional poem. But I think, it would be great if you add few more lines to it.
पतझड़ सी,
रेगिस्तानी रेत सी,
सूख चुकी माँ
nice lines. All the best and keep posting. cheers, dinesh
है अनपढ़ ,सहमी औ अस्वस्थ ,बूढी होती माँ
पतझड़ सी,रेगिस्तानी रेत सी,सूख चुकी माँ
Bahut Achcha.
कजरी छंद ,सोहर वाले गीत,गाती रहे माँ...!!
सार्थक है
आपकी रचनाधर्मिता पे फ़िर लिखूंगा
बधाइयां
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