मन मेरे..

3 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये

झोंटों के उझराइल में कब तलक हौंड़ाये रहोगे, चिल-चिल धूप की नहाइल में, बालू गड़ें गोड़ की गड़ि‍याइल में? कब. कभी पलकों पर सरसराती, थरथराती बयार उतरेगी? छाती में उजियार? बरसेगी? कि सब बिछिलते, बहिते-बहिते दिन में रात और रात में झंझाबात जइसन बीतेगा?..

 
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जोशिम - March 27, 2008 7:35 PM

धीर ही धरे ?

ajay kumar jha - March 27, 2008 8:32 PM

aisan bhatbhatail bhaashaa mein etnaa gehraa chintan aape kar sakte hain mahaaraaz.

अजित वडनेरकर - March 27, 2008 11:53 PM

मन रे ....तू काहे न धीर धरे !

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